सुशांत सुसाइड केस: हर हताशा को हिम्मत से रौंद डालिए और ज़िंदगी के असली चैम्पियन बनिए
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Dare down every frustration and be the real champion of life: Abhiranjan Kumar

अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और मानवतावादी चिंतक हैं। कई किताबों के लेखक और कई राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार चैनलों के संपादक रह चुके अभिरंजन फिलहाल न्यूट्रल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं।


10 मिनट में समझें मौत के विचार से आज़ाद होने का तरीका (10 minutes read)

जीवन में कभी न कभी हताश, निराश, उदास कौन नहीं हुआ है? किसकी ज़िंदगी में किसी के प्रेम में दिल का टूटना नहीं हुआ होगा? या फिर किसकी पीठ में किसी न किसी ने छुरा नहीं घोंपा होगा? किसकी राह में किसी न किसी ने कांटे नहीं बिछाए होंगे? किसकी ज़िंदगी में उसकी सफलता से जलने वाले और उसे आगे बढ़ने से रोकने की साज़िश करने वाले नहीं होंगे? 

फिर सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या क्यों की? अभी उसकी उम्र ही क्या हुई थी? केवल 34 साल का तो था वह। अगर मनुष्य की जिंदगी 100 साल की मानी जाए, तो 66 साल तो उसके और भी बचे हुए थे। जिस शख्स ने मेरे बिहार की मिट्टी से निकलकर दिल्ली और मुंबई तक अपने दम और अपनी प्रतिभा से इतनी कम उम्र में इतना कुछ हासिल कर लिया, वह अगले 66 सालों में और क्या हासिल नहीं कर सकता था? ज्यादा हासिल करने के लिए ज्यादा काम भी करने होते हैं और ज्यादा दिन जीना भी होता है।

वंशवाद के खिलाफ बोलना अच्छा, इसके कारण कुंठित रहना बुरा!

मैंने कंगना रनौत को सुना। आजकल की परिभाषा में “लोकल” लड़की है वह, लेकिन बहुत “वोकल” है, इसलिए मैं उसकी बहुत इज्जत करता हूं। कंगना ने कई बातें कहीं हैं, उन बातों पर अवश्य विचार होना चाहिए। लेकिन ये ऐसी बातें नहीं हैं, जिनसे टूटकर कोई आत्महत्या कर ले। कंगना ने बॉलीवुड में वंशवाद की बात कही। लेकिन मुझे यह बताइए, वंशवाद किस फील्ड में नहीं है? मानव सभ्यता के सबसे बुनियादी प्रोफेशन खेती की बात कर लीजिए। क्या खेती में वंशवाद नहीं है? हम सभी जानते हैं कि किसान के खेत उसके बाद उसके बच्चे ही जोतते हैं। उद्योगों के मालिक भी अपने बच्चों को ही मिल्कियत सौंपते हैं। शिक्षकों, नौकरशाहों, इंजीनियरों, डॉक्टरों इन सबको अपने-अपने प्रोफेशन में चलने वाले रैकेट के बारे में बखूबी पता होता है, इसलिए उनके बच्चों का शिक्षक, नौकरशाह, इंजीनियर, डॉक्टर बन जाना अधिक आसान होता है। …और राजनीति तो बदनाम है ही वंशवाद के लिए। बड़े नेता का बेटा यदि अनपढ़, हत्यारा या बलात्कारी हो, तो भी बाप की प्रोफाइल के हिसाब से “कर्णधार” तो वही बनेगा। इसलिए बॉलीवुड भी अगर अपवाद नहीं है, तो इतनी हाय-तौबा क्यों? कोई भी अपनी खेती अपने बच्चों को ही सौंपेगा, यह ध्रुवसत्य की तरह अटल है।

इस संदर्भ में एक और बात ठीक से समझ लीजिए। चाहे कितना भी बड़ा वंशवादी क्यों न हो, उसकी किसी न किसी एक पीढ़ी को संघर्ष करना ही पड़ा है। एक पीढ़ी संघर्ष करती है, तभी उसकी बुनियाद पर अगली पीढ़ियों की इमारतें बुलंद होती हैं। आज हम जिन्हें वंशवादी कह रहे हैं, स्वयं वे या उनकी किसी पिछली पीढ़ी ने उतना ही संघर्ष किया होता है, जितना हम और आप आज कर रहे हैं। यहां तक कि कंगना और सुशांत जैसे लोग भी जब एक मुकाम हासिल कर लेते हैं, तो इससे उनके बच्चों को भी वही सुविधाएं मिलने लगती हैं, जो किसी स्टार का बच्चा नहीं होने के कारण उन्हें नहीं मिल पाई थीं। इसलिए वंशवाद के खिलाफ बोलना जितना अच्छा है, इसके कारण कुंठित रहना उतना ही बुरा है।

ग्लास आधा खाली है यही मत देखो, आधा भरा है यह भी देखो!

मैंने कांग्रेस नेता संजय निरुपम का ट्वीट भी देखा। उन्होंने बताया है कि पिछले छह महीने में सात फिल्में सुशांत से छीन ली गई थीं। लेकिन मेरा यह कहना है कि गिलास आधा खाली है, यही क्यों देखते हैं आप? गिलास आधा भरा हुआ है, यह भी तो समझिए। सुशांत से 7 फिल्में गईं, तो उनके पास 3 फिल्में आईं भी तो? कई अभिनेता तो ऐसे हैं, जो साल में केवल एक फिल्म ही करते हैं, फिर भी संतुष्ट रहते हैं। इसलिए, कोई आपका रास्ता रोक रहा है, इससे आपके इरादे और मज़बूत होने चाहिए, न कि आप टूटकर सुसाइड कर लें।

जब सभी रास्ते बंद होते लगें, तब एक नई राह गढ़ने के बारे में सोचो!

मैं अपनी बात बताता हूं। जब भी मेरे सामने ऐसी परिस्थितियां आईं, जब लगा कि कुछ लोग या गिरोह द्वेष, ईर्ष्या, असुरक्षा भावना, प्रतियोगिता या वैचारिक भिन्नता के कारण साज़िशन मेरा रास्ता रोक रहे हैं, यहां तक कि जब-जब मुझे लगा कि अब सारे रास्ते बंद हो गए हैं, तब-तब मैंने मां सरस्वती को थैंक्यू ही बोला, यह कहते हुए कि लगता है मां, तुम मुझे एक नई राह गढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हो, और फिर मैं एक नया रास्ता बनाने में जुट जाता हूं। इसी तरह जब भी किसी ने मेरी लकीर छोटी करने की कोशिश की है, मैं अपना दिल बड़ा करता हूँ, उसे माफ़ करता हूँ और एक बड़ी लकीर खींचने के बारे में सोचना शुरू कर देता हूँ।

हां, ऐसा करने के लिए आपको सफलता और असफलता की अपनी समझ में सुधार लाना होगा। जैसे मैं तो सबसे बड़ी सफलता यही मानता हूँ कि बिना टूटे, बिना झुके, बिना समझौता किये, अपने स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखते हुए अपनी शर्तों पर जीवन जी लूँ। सफलता-असफलता के मामले में समाज के अलग-अलग लोगों के वक्तव्यों, आकलनों और सर्टिफिकेटों को प्रलाप और खाली दिमाग वाले शैतान की सोच मानकर चला कीजिए। रत्ती भर परवाह न कीजिए इनकी।

याद रखिए, एक मामूली धोबी के प्रलापों में उलझने से तो राम और सीता की ज़िंदगी तबाह हो गई, फिर आप और हम किस खेत की मूली हैं? इसलिए अपनी अंतरात्मा से सही रहिए और फिर बोलने दीजिए, जिसे जो बोलना है। हम और आप क्या जीवन भर दूसरों से सर्टिफिकेट ही लेते रहेंगे? इसलिए जीवन जीने का सही तरीका इस लोकप्रिय कहावत में समझ लीजिए- कुत्ते भौंकें हज़ार, हाथी चला बाज़ार।

बिके हुए पुरस्कारों को ख़रीदकर किसकी नज़र में महान बन जाओगे?

कई लोग कह रहे हैं कि सुशांत में टैलेंट था, लेकिन उसके हिसाब से उसे पुरस्कार नहीं मिले। तो मेरा कहना है कि ऐसा अवश्य हुआ होगा। लेकिन जो चीज़ आपके हाथ में नहीं है या जो चीज़ आप तय नहीं कर सकते, उसके लिए परेशान क्या होना? जैसे मैं तो कभी भी कहीं भी किसी भी पुरस्कार या सम्मान के लिए आवेदन ही नहीं देता। जानता हूं कि इस खेल में ऊपर चढ़ने के लिए आपको बहुत नीचे गिरना होता है, लेकिन अगर गिरना मंज़ूर न हो तो क्या करें? कुंठित रहा करें? जानता हूं कि ये पुरस्कार और सम्मान विभिन्न गिरोहों द्वारा अपने ही गिरोह के सदस्यों को दिए-लिए जाते हैं, लेकिन अगर किसी गिरोह में शामिल होने के लिए अंतरात्मा नहीं कहती, तो क्या करें? अंतरात्मा को कुचल दें? जानता हूं कि अनेक पुरस्कार और सम्मान आज पैसे और पहुंच से भी खरीदे और बेचे जा रहे हैं, तो क्या किया जाए? बिके हुए पुरस्कारों को खरीदकर हम किसकी नज़र में महान बनना चाहते हैं? क्या दूसरों की नज़र में महान बनने के लिए हम अपनी ही नज़र से गिर जाएं?

इसलिए जो लोग पुरस्कारों और सम्मानों से व्यक्तियों का कद और चरित्र नापते हैं, उन्हें ऐसा करने दीजिए। लेकिन दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला, फिर भी तमाम पुरस्कृत लोगों से ज्यादा आदर हम उनका करते हैं। यह भी समझ लीजिए कि जिंदगी एक मैराथन रेस की तरह है। 100-200 मीटर वाली दौड़ नहीं है यह। इसलिए इसमें कछुए की तरह धीमी गति से निरंतर चलने वाले भी जीत सकते हैं और खरगोश की तरह तेज़ चलने वाले घमंडी भी परास्त हो सकते हैं। इसलिए न तो स्वयं अपनी तुलना किसी से कीजिए, न दूसरों द्वारा की जा रही तुलनाओं पर ध्यान दीजिए।

प्रेम के मामले में ये 7 वचन याद रखो, नहीं करना पड़ेगा सुसाइड!

आजकल प्रेम में पड़कर भी अनेक लड़के-लड़कियां सुसाइड करते हैं। लेकिन एक बात जान लीजिए कि जब से हमने पाश्चात्य संस्कृति अपनाई है, तभी से इस कारण सुसाइड भी बढ़ गए हैं और ऑनर किलिंग भी होने लगी है। उच्छृंखल सेक्सकामी, फ़र्ज़ी फैमिनिस्ट, क्रूर कम्युनिस्ट और पतित पूंजीपति साज़िशन हमारी संस्कृति की आलोचना अवश्य करते हैं, लेकिन इसी संस्कृति में सबकी सुरक्षा निहित थी। जैसे-जैसे हम इससे दूर होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हर व्यक्ति, हर परिवार खतरे में आता जा रहा है। इसलिए प्रेम-संबंधों के मामले में ये 7 सूत्र “सात वचन” की तरह अपना लीजिए, फिर कभी सुसाइड नहीं करना पड़ेगा-

  1. कोई लड़का या कोई लड़की परिपूर्ण नहीं है, इसलिए जीवन में सबसे पहले जिसका साथ मिल जाए, पूरी एकनिष्ठता से उसका साथ निभाइए और जिसका साथ न मिले, उसके लिए तड़पना छोड़ दीजिए। बेहतर, बेहतर, और बेहतर पार्टनर की तलाश अंतहीन है और पागलपन है।
  2. हमेशा उससे प्यार कीजिए, जो आपसे प्यार करता या करती हो। जो आपसे प्यार नहीं करता या करती, उसके प्यार में पागल में होना निकृष्ट कोटि की मूर्खता है।
  3. लड़का या लड़की भोजन नहीं हैं कि हर रोज़ नया खाने का जी करे। मुझे पता है कि कई लोग ऐसा घटिया उदाहरण देते हैं, इसीलिए हमने आपको आगाह कर दिया।
  4. जिससे विवाह कीजिए, उसी से प्रेम कीजिए, ईगो को बीच में मत लाइए और एडजस्ट करना सीखिए।
  5. विवाह से पहले किसी के भी साथ और विवाह के बाद परपुरुष या परस्त्री के साथ शारीरिक संबंध मत बनाइए। तात्पर्य यह कि वासना में पड़कर प्रेम का गला मत घोंटिए।
  6. मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी जीव-जंतु सिर्फ संतति के लिए सेक्स करते हैं। यह मनुष्य ही है, जिसकी सेक्सलोलुपता अमानवीय, अनैतिक और अप्राकृतिक रूप धारण कर लेती है। इसलिए अपने प्रेम-संबंध को सेक्सप्रधान मत बनने दीजिए।
  7. अपने निजी संबंध के बीच किसी भी अन्य को प्रवेश मत करने दीजिए। प्यार और भरोसे से ज़िंदगी गुज़ारिए।

उच्छृंखल सेक्स-लोलुपता की शिकार है फिल्म इंडस्ट्री!

फिल्म इंडस्ट्री में प्रेम के नाम पर उच्छृंखल सेक्सलोलुपता वाला कीड़ा बहुतों को चाटता रहता है। वहां की संस्कृति ही कुछ ऐसी है कि अक्सर कोठे भी उससे बेहतर लगते हैं। लिव-इन-रिलेशनशिप, बार-बार पार्टनर बदलना, मल्टीपल अफेयर, अनलिमिटेड ब्रेकअप… इन सबको वहां स्टेटस सिम्बल माना जाता है, जबकि ठीक से देखें तो ये सभी “यूज़ एंड थ्रो” वाली नीच मानसिकता के भी निकृष्टतम उदाहरण हैं। और तो और वहां कास्टिंग काउच और बलात्कार जैसे मामले भी किस पैमाने पर हो रहे हैं, हाल ही में मीटू कैंपेन ने भी इसकी पुष्टि कर दी थी। खुद को जस्टिफाइ करने के लिए ये लोग हमारे समाज को भी अपने ही जैसा बना देना चाहते हैं। इसीलिए, रील लाइफ में रोमांस बेचने वाले ये व्यापारी समाज में अश्लीलता तो फैला ही रहे हैं, प्रेम के प्रति लोगों की समझ को भी विकृत कर रहे हैं। अब अनेक पति-पत्नी अपने पार्टनर से वैसा ही प्रेम ढूंढ़ते रहते हैं, जैसा प्रेम उन्हें सिनेमाई परदे पर दिखाई देता है। पति-पत्नी के बीच अतृप्ति और असंतुष्टि के बढ़ते मामलों के पीछे यह भी एक बड़ा कारण बन गया है।

सुसाइड के अन्य 5 कारण

दुनिया भर में सुसाइड अन्य कई कारणों से भी हो रहे हैं। जैसे,

  1. भयानक कर्ज में डूबकर या भयानक घाटे का शिकार होकर
  2. भयानक साज़िश में फंसकर या फंसाया जाकर
  3. अपराध करने के बाद या बिना अपराध किये ही भयानक कानूनी चंगुल में उलझकर
  4. कारणवश या अकारण ही समाज से भयानक किस्म का तिरस्कार या बहिष्कार झेलकर
  5. पढ़ाई में बेहतर करने या बेहतर रिजल्ट लाने का भयानक दबाव महसूस करने पर

जीवन में आस्था की एक डोर ज़रूरी है!

इनमें से सभी कारणों के उपचार भी अलग-अलग हैं, इसलिए विस्तार में नहीं जाते हुए एक आखिरी बात बता रहा हूं, जो भीषण से भीषण हताशा और नाउम्मीदी के दौर से आपको बचाएंगे। ईश्वर को साइंस प्रमाणित नहीं करता, लेकिन उसका जादू हम सभी कभी-न-कभी अपने जीवन में देखते रहते हैं। इसलिए नास्तिकों और कम्युनिस्टों के चक्कर में मत पड़िए। जब मनुष्य और समाज से व्यक्ति की सारी उम्मीदें टूट जाती हैं, तो वह ईश्वर ही है, जो उसके लिए बहुत बड़ा संबल बन सकता है। डिप्रेशन की दवाएं तो शायद आपकी ज़िंदगी बचा भी न पाएं, लेकिन ईश्वरीय आस्था की यह अदृश्य डोर उस दौर में भी न सिर्फ आपकी टूटती सांसों को सिल सकती है, बल्कि आपको मौत के भंवर से निकाल कर ज़िंदगी के किनारे पर भी पहुंचा सकती है।

हां, ईश्वरीय आस्था तब बुरी होती है जब आप अंधविश्वास और कट्टरता में उलझ जाते हैं और अपनी आस्था के कारण दूसरों को अपनी हिंसा और असहिष्णुता का शिकार बनाने लगते हैं। लेकिन यदि आप इसके सहारे अपने जीवन में उदारता, धैर्य, ईमानदारी, सहिष्णुता और मानवता के अन्य गुणों का समावेश कर सकें, तो धीरे-धीरे आप भी देवत्व की ओर बढ़ चलते हैं। इसपर अभी ज़्यादा नहीं लिखूंगा, लेकिन ईश्वर के बारे में मेरी थ्योरी हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, बौद्धों, यहूदियों- इन सबकी ज़्यादातर प्रचलित मान्यताओं से भिन्न है। इसलिए इसे मेरा डिस्क्लेमर मानकर चलिए कि ईश्वर की शरण में जाना किसी (अ)धर्म का गुलाम बनना या किसी बाबा, फादर, ग्रंथी, मुल्ले की शरण में जाना नहीं है।

खिड़कियां खोल दो, डिप्रेशन भाग जाएगा!

और हां, छोटा-मोटा डिप्रेशन तो कमरे की सारी खिड़कियां खोल देने; बाहर निकलकर पेड़-पौधों, नदियों-पहाड़ों, सूरज-चांद-सितारों को जी भर कर देखने; शीतल हवा में बांहें फैलाकर लंबी-लंबी सांसें लेने; बारिश में भीगने; योग, ध्यान और प्राणायाम करने से ही खत्म हो जाता है। याद रखिए, जीवन में कोई भी नाउम्मीदी इतनी बड़ी और स्थायी नहीं, कि उसके चक्कर में उम्मीदों का गला घोंट दिया जाए। इसलिए, हर हताशा को हिम्मत से रौंद डालिए और ज़िंदगी के असली चैम्पियन बनिए। धन्यवाद।



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