धर्म रहस्य: भगवान जगन्नाथ तो हर साल 15 दिन के लिए होते हैं क्वारंटाइन!
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Lord Jagannath has been quarantined for 15 days every year since centuries

इस लेख की लेखिका सर्जना शर्मा जानी-मानी पत्रकार और संप्रति दैनिक सन्मार्ग में डिप्टी न्यूज़ एडिटर हैं।

हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा, जिसे स्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है, को 108 कलशों से स्नान करने के बाद भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा बीमार हो जाते हैं। इसके बाद तीनों स्नान बेदी से पंद्रह दिन के लिए सीधे अणासर में चले जाते हैं। अणासर भगवान के मंदिर के गर्भगृह से दूर एकांतवास स्थान को कहते हैं। इस दौरान वे भक्तों को दर्शन नहीं देते हैं। प्रसाद के भोग की जगह उन्हें केवल तरल पेय दिया जाता है और उनकी अभ्यंगं मालिश की जाती है।

एकांतवास में काढ़े का सेवन करते हैं भगवान!

ऐसा सदियों से होता आ रहा है। हिंदू कैलेंडर के ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा को स्नान बेदी पर स्नान करने के बाद आदि काल से भगवान जगन्नाथ पंद्रह दिन के लिए अणासर में चले जाते हैं। दरअसल ज्येष्ठ पूर्णिमा भगवान जगन्नाथ की जन्मतिथि है। इस दिन से लेकर एक महीने तक वो दैतापति सेवकों के संरक्षण में रहते हैं।

भगवान जगन्नाथ का स्नान करना, बीमार पड़ना और एकांतवास में जाना कोई नयी बात नहीं है।लेकिन इस साल 2020 में जब कोरोना आया और 14 दिन के लिए मरीजों को क्वारंटाईन होना पड़ रहा है, तो भगवान जगन्नाथ की इस नीति (ओड़िशा में भगवान की पूजा के विधि विधान को नीति कहा जाता है) को आधुनिक परिपेक्ष्य में अणासर नीति समझने का अवसर मिला। जिसे हम कोरोना काल में क्वारन्टाईन कह रहे हैं, वो तो हमारी हज़ारों वर्ष पुरानी नीति है।

चारों दिशाओं में चार पवित्र धामों में से एक श्री जगन्नाथ धाम भारत के पूर्वी राज्य ओड़िशा के शहर पुरी में है। पुरी बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा पवित्र शहर है। यहां भगवान विष्णु जगन्नाथ रूप में विराजते हैं। ये एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां भगवान के विग्रह काष्ठ के हैं और यहां भगवान अपने भाई और बहिन के साथ हैं। पूरे देश में यही एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां वैदिक ब्राह्मण और शबर जनजाति के सेवक दैतापति मिल कर भगवान की नीतियां करते हैं और पूजा पाठ करते हैं।

अणासर में एकांतवास, रथ यात्रा, बहुड़ा यात्रा, सोना वेष, अधर पाना और नीलाद्री विजय लगभग एक महीना भगवान जगन्नाथ दैतापतियों की पूर्ण देखरेख में रहते हैं। अभी बात केवल सामयिक विषय से संबंधित। बीमार पड़ने के बाद भगवान वैसे ही रहते हैं जैसे कोई भी बीमार व्यक्ति रहता है। रत्न सिंहासन पर जो वस्त्र भगवान पहनते हैं वो उतार देते हैं। बिल्कुल सादे सूती श्वेत रंग के आरामदेह वस्त्र पहनते हैं। जो भी आभूषण शरीर पर होते हैं वो सब उतार दिए जाते हैं।

जिस कमरे में उन्हें रखा जाता है वहां केवल दैतापति जा सकते हैं। दैतापति स्वयं को भगवान जगन्नाथ का भाई मानते हैं। यानि केवल आपके परिवार के व्यक्ति। भोजन में केवल फल, जूस और तरल पेय। बीमार पड़ने के पांचवें दिन बड़ा उड़िया मठ से फुलेरी तेल आता है, जिससे भगवान के शरीर पर मालिश की जाती है। इस तेल को बनाने की विधि भी बहुत अनोखी है। मिट्टी के एक बर्तन में तिल का तेल कुछ औषधियां और सफेद फूल भर कर ज़मीन के नीचे गाड़ दिया जाता है। हर वर्ष स्नान पूर्णिमा के दिन तेल का बर्तन दबा दिया जाता है और एक साल बाद स्नान पूर्णिमा के दिन ही बर्तन ज़मीन से निकाला जाता है।

आयुष मंत्रालय भी आजकल बता रहा है कि कोरोना से बचने के लिए अपने हाथ पैरों में तेल की मालिश करें और कुछ बूंदें नाक में भी डालें। भगवान पर रक्त चंदन और कस्तूरी का लेप किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के वैद्य उनके लिए काढ़ा से बने मोदक लेकर आते हैं। दशमूलारिष्ट में नीम, हल्दी, हरड़, बेहड़ा, लौंग आदि अनेक जड़ी-बूटियां मिलाते हैं और नर्म मोदक बना कर भगवान को दसवें दिन खिलाए जाते हैं। और क्या क्या औषधियां और जड़ी बूटियां है राजबैद्य ये गुप्त रखते हैं।

15 दिन का सेल्फ आइसोलेशन!

एक साल तक श्री मंदिर में रह कर भगवान लाखों भक्तों को दर्शन देते हैं। दिन में उनकी अनेकों सेवाएं होती हैं। श्री मंदिर के गर्भगृह में रत्न सिंहासन के भीतर बिजली या बिजली का कोई उपकरण प्रयोग नहीं किया जाता। भगवान के विग्रह को भारी भरकम पोशाक, गहने फूलों का श्रृंगार, धूप दीप आरतियां कुल मिला कर रात की शयन आरती तक लंबा शेड्यूल।

अणासर में भगवान को मंदिर में होने वाली दैनिक क्रियाओं से मुक्ति मिल जाती है। भक्तों को भी पंद्रह दिन दर्शन नहीं देते। यानि सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन। खानपान बिल्कुल बदल जाता है तरल पेय और फल। चौदह दिन के बाद उनके विग्रहों को फिर से सजाया जाता है। रथ यात्रा वाले दिन उन्हें खिचड़ी बना कर खिलायी जाती है। रथ यात्रा से पहले फिर रत्न सिंहासन पर आते हैं भक्तों को नवजौबन (नवजौबन की तुलना आप रिजुनिवेशन से भी कर सकते हैं) दर्शन देकर रथ यात्रा पर अपनी मौसी रानी गुंडीचा के घर चले जाते हैं।

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