एनकाउंटर से नहीं होगा अपराध का अंत, न्यायिक सुधार के लिए इन 16 उपायों पर गौर करना ज़रूरी
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Encounters can not end crime, it is important to consider these 16 measures for judicial reform

अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और मानवतावादी चिंतक हैं। कई किताबों के लेखक और कई राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार चैनलों के संपादक रह चुके अभिरंजन फिलहाल न्यूट्रल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं।


लगता है जैसे “शास्त्रीय संगीत” से ज़्यादा आजकल “पॉप म्यूजिक” के चाहने वाले हैं, वैसे ही “शास्त्रीय न्याय” से ज़्यादा आजकल लोगों को “पॉप जस्टिस” पसंद आता है। जैसे शास्त्रीय संगीत में लंबे लंबे आलाप होते हैं, जिससे अनेक श्रोता बोर होकर ऊंघने लगते हैं, ठीक वैसे ही शास्त्रीय न्याय में भी न्याय मिलने की प्रक्रिया इतनी लंबी, ख़र्चीली, अन्याय और पक्षपात भरी है कि जनता अब हैदराबाद गैंगरेप केस और विकास दुबे जैसे मामलों में सुनियोजित एनकाउंटर को ही समाधान मानने लगी है।

यह हमारी सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक और चिंताजनक बात होनी चाहिए। इसलिए आइए, अब इसपर विचार करें कि आम गरीब गुरबों को प्रतिदिन जो अपराध झेलने पड़ रहे हैं, उन्हें कम करने के लिए न्यायिक व्यवस्था में किन आमूलचूल बदलावों की ज़रूरत है? 
इस बारे में मेरे कुछ स्पष्ट सुझाव हैं, जिन्हें देश की समीक्षा के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ।

1. बढ़ती आबादी के मद्देनजर जैसे देश में अस्पतालों, स्कूलों, बैंक शाखाओं की संख्या बढाई जा रही है, वैसे ही अदालतों और जजों की संख्या भी बड़े पैमाने पर बढ़ाई जाए।

2. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की शाखा हर ब्लॉक में हो और हाई कोर्ट की शाखा हर कमिश्नरी में हो। सभी मुख्यालयों और शाखाओं में जजों की संख्या मौजूदा संख्या से कम से कम 10 गुणा अधिक हो।

3. देश की राजधानी दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट की भी कम से कम तीन और शाखाएं मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में स्थापित की जाएं। इन चारों शाखाओं में कम से कम 500 जज हों और बेटा-पोतावाद वाला कोलेजियम सिस्टम समाप्त हो।

4. सभी अदालतों में साल में कम से कम 292 दिन काम हो। इन 292 दिनों के पीछे मेरी वह थ्योरी है, जिसके मुताबिक सरकार द्वारा संचालित किसी भी संस्थान में कुल अवकाश और छुट्टियां 20 प्रतिशत दिनों से अधिक नहीं होनी चाहिए। 

5. किसी भी मामले की सुनवाई पूरी करके फैसला देने के लिए निचली अदालतों में 90 दिन की सीमा तय कर दी जाए। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी यह सीमा 90-90 दिनों की ही हो। यदि सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका आती है या राष्ट्रपति के पास दया याचिका जाती है, तो इस प्रक्रिया को भी अंतिम रूप से निपटाने के लिए 90 दिन की सीमा हो। ऐसा करने से लोगों को तीन महीने से लेकर एक साल के भीतर न्याय मिल सकेगा। इससे लोगों का समय, श्रम, धन बचेगा और उनकी कार्यक्षमता और उत्पादकता में वृद्धि होगी, जिससे अदालतों पर बढ़े हुए खर्च की स्वतः भरपाई हो जाएगी। यदि नहीं होगी, तो इनकम टैक्स पर 1 से 3% तक “स्पीडी जस्टिस सेस” लगा दीजिए।

6. हर न्यायिक सुनवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग हो और इसे सार्वजनिक डोमेन में रखा जाए ताकि कोई भी आम आदमी जो उस मामले के बारे में जानना चाहता है या अध्ययन करना चाहता है, उसे देख सके।

7. हर जज के प्रमोशन में कानूनों की उसकी जानकारी के अलावा केवल और केवल इस बात का ध्यान रखा जाए कि उसने अपने अब तक के कार्यकाल में कितने मामले निपटाए और उनमें से कितने मामलों में उसके फैसलों को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी गई और यदि चुनौती दी गई तो उनमें से कितने मामलों में ऊपरी अदालत ने उसके दिए फैसले को बरकरार रखा।

8. पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों के लिए भी किसी केस की जांच करने और सबूत जुटाने के लिए इसी हिसाब से समय सीमा तय की जाए, ताकि उपरोक्त फॉर्मूले के अनुरूप मामला रजिस्टर होने के दिन से तीन महीने से लेकर एक साल के भीतर कोर्ट से अंतिम फैसला आना सुनिश्चित किया जा सके।

9. पुलिसकर्मियों और अन्य जांच अधिकारियों की पदोन्नति में भी इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए कि उनकी जांच के कारण कितने मामलों में समय सीमा के भीतर न्याय हो सका और कितने मामलों में उनके द्वारा जुटाए गए सबूतों को चुनौती नहीं दी जा सकी और यदि चुनौती दी गई तो कितने मामलों में वे अकाट्य निकले।

10. जजों और जांचकर्ताओं को भी गलत फैसले देने या गलत सबूत जुटाने या सबूत न जुटा पाने के के लिए दंडित करने का प्रावधान हो।

11. राजनीतिक दलों को हत्या, लूटपाट, अपहरण, फिरौती, बलात्कार, आय से अधिक संपत्ति जुटाने और जातीय एवं साम्प्रदायिक दंगा कराने जैसे संगीन मामलों में आरोपित व्यक्ति को चुनावी टिकट देने से रोका जाए।

12. सांसदों और विधायकों के मामलों में भी उपरोक्त फॉर्मूले के अनुसार तीन महीने से एक साल के भीतर अंतिम रूप से न्याय हो जाए और दोषी पाए जाने पर तत्काल प्रभाव से उनकी सदस्यता समाप्त कर सभी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाए एवं कानून के अनुसार यथोचित दंड दिया जाना सुनिश्चित किया जाए।

13. उपरोक्त 12 बिंदु सुनिश्चित करने के लिए एक साल के भीतर देश के कानूनों की गहन समीक्षा की जाए और अगले एक साल के भीतर उनमें अनुकूल बदलाव भी सुनिश्चित कर दिये जाएं।

14. इस प्रक्रिया में यह विशेष रूप से सुनिश्चित किया जाए कि कानून और व्यवस्था हर आम और खास के लिए व्यावहारिक रूप से भी एक समान हो जाए।

15. देश में एक स्वतंत्र आयोग बनाया जाए, जो हर पांच साल पर न्यायिक व्यवस्था में किए गए बदलावों के परिणामों की समीक्षा करता रहे और आवश्यक होने पर आगे भी उचित बदलाव करने के मार्ग प्रशस्त करता रहे।

16. कोई भी व्यवस्था बनाते समय यह ध्यान रहे कि देश को ठहरे हुए बजबजाते नाले जैसी नहीं, निरंतर बहती हुई नदी जैसी व्यवस्था चाहिए, ताकि उसकी गंदगी सहज-स्वाभाविक प्रक्रिया से अपने आप साफ होती रहे।

मेरा कहना है कि अगर सरकारें ईमानदार हैं तो न्याय व्यवस्था दुरुस्त करने पर बात हो, पुलिस ईमानदार है तो अपराधी तुरंत पकड़ लिये जाएं और सबूतों से छेड़छाड़ न हो सके, कोर्ट ईमानदार है तो त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई करके हर आम से आम, गरीब से गरीब नागरिक के लिए न्याय सुनिश्चित करे, राजनीतिक दल ईमानदार हैं तो अपराधियों को टिकट न दें और वोटर ईमानदार हैं तो अपराधियों को वोट देकर संसद और विधानसभाओं में पहुंचाकर माननीय उर्फ भारत भाग्यविधाता बनाना बंद करें।

याद रखिए, हैदराबाद गैंगरेप केस के आरोपियों या विकास दुबे जैसे सुनियोजित एनकाउंटर से जनता की क्षणिक उत्तेजना को तो शांत किया जा सकता है, लेकिन इनसे न तो अपराध पर लगाम कसना संभव है, न ही अपराधियों का अंत कभी हो सकता है। इतना ही नहीं, इससे अपराध और अपराधियों को पालने-पोसने-बड़ा करने वाले सिस्टम में सुधार की भी कोई उम्मीद नहीं जगती। धन्यवाद।



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