भारत के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के ख़िलाफ़ है काशी के ज्ञानवापी ढांचे में नमाज पढ़ना
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Abhiranjan Kumar’s opinion on Gyanwapi Structure of Varanasi

अभिरंजन कुमार जाने-माने पत्रकार, कवि और मानवतावादी चिंतक हैं। कई किताबों के लेखक और कई राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय समाचार चैनलों के संपादक रह चुके अभिरंजन फिलहाल न्यूट्रल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं।


बाबरी ढांचे को मैंने देखा नहीं था। जब उसे ढहाया गया था, तब मैं इंटरमीडिएट द्वितीय वर्ष का छात्र था। फिर भी यही मानता था कि उसे ढहाया नहीं जाना चाहिए था। ऐसी मान्यता उस नैरेटिव के आधार पर बनी थी, जिसमें गंगा जमुनी तहजीब की हिफाज़त के लिए विवादास्पद मुद्दों और स्थलों पर टकराव से बचना ज़रूरी बताया जाता था।

लेकिन मैंने काशी के ज्ञानवापी ढांचे को अपनी आँखों से देखा ही नहीं है, अपने हाथों से छुआ भी है। 1994 या 1995 में। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान। अगर मैं कट्टरपंथी होता, तो मैं भी उसी दिन मान लेता कि इस ढांचे को भी गिरा दिया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति इसे देखकर कह सकता है कि मस्जिदनुमा इस ढांचे को एक मंदिर को तोड़कर उसके भग्नावशेष पर बनाया गया है। ऐसा कहने के लिए न तो किसी सबूत की ज़रूरत है, न ही किसी खुदाई की, न किसी इतिहासवेत्ता के ज्ञान की। इस मन्दिर को उसी औरंगजेब नाम के पापी आक्रांता ने गिरवाया था, जिसके नाम पर कांग्रेस की कलुषित सरकार ने राजधानी दिल्ली में सड़क का नामकरण कर दिया।

काशी में मंदिर तोड़कर उसकी दीवार पर बना ज्ञानवापी ढांचा

बहरहाल मैं कट्टरपंथी नहीं था, न हूं। मैं भारत के संविधान में यकीन करने वाला एक उदारवादी मानवतावादी हूं। यद्यपि धर्मनिरपेक्षता को भारत के संविधान में संविधान निर्माताओं द्वारा नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की निजी परिस्थितियों के कारण उनकी ही सरकार द्वारा जोड़ा गया। इसके बावजूद इस फर्जी व्यक्तिगत धर्मनिरपेक्षता का भी सम्मान करता हूँ, जिसे पूरे देश पर इसके बावजूद थोप दिया गया कि धर्म के नाम पर यह देश पहले ही बंट चुका था।

अब कोई मुझे यह बताए कि किसी धर्मनिरपेक्ष देश में किन मूल्यों के तहत मंदिर तोड़कर बनाए गए इस मस्जिदनुमा ढांचे में नमाज पढ़ी जा रही है? क्या एक समुदाय के पूजा स्थल को तोड़कर बनाई गई इमारत में दूसरे समुदाय को इबादत की इजाज़त होनी चाहिए? यदि नहीं, तो कहां है भारत का संविधान? कहां है भारत की धर्मनिरपेक्षता? और कहाँ हैं धर्मनिरपेक्षता के वे पैरोकार, जिन्हें इस ढांचे में इबादत के नाम पर निरंतर किया जा रहा यह कुकृत्य दिखाई नहीं दे रहा?

क्या धर्मनिरपेक्षता का ठेका एक ही समुदाय का है? दूसरे समुदाय के कर्ता धर्ताओं को शर्म भी नहीं आती, जब वे पहले समुदाय के पूजा स्थल को तोड़कर बनाए गए ढांचे में नमाज पढ़ने जाते हैं? क्या इस किस्म की बेशर्मी, लंपटता और आक्रमणकारी विध्वंसकता के रहते भारत में धर्मनिरपेक्षता का बचाव संभव है? औरंगजेब एक पापी था, मान लिया, लेकिन ये लोग कौन से शुद्धात्मा हैं, जो इस ढांचे में जाकर नमाज पढ़ रहे हैं? क्या उनका खुदा, उनका अल्लाह ऐसी इमारतों में बसता है, जिन्हें दूसरे मजहबों के पूजा स्थलों को तोड़कर बनाया गया है?

हालांकि काशी के इस ज्ञानवापी ढांचे का मामला भी कोर्ट में विचाराधीन है, लेकिन यह तय है कि एक न एक दिन भारत की जनता इस्लामिक आक्रांताओं द्वारा मंदिर तोड़कर बनवाई गई इस अवैध इमारत और उसकी ज़मीन पर भी कब्जा हासिल करके ही रहेगी।

इसलिए क्या यह बेहतर नहीं होगा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता और गंगा जमुनी तहजीब के सभी पैरोकार सामने आएं और कहें कि यह ढांचा हम सबके माथे पर एक कलंक है, इसलिए तत्काल प्रभाव से यहाँ पर नमाज रोकी जाए, क्योंकि दूसरों के पूजा स्थल तोड़कर बनाए गए किसी ढांचे में नमाज पढ़ना भी अपने आप में एक सतत आक्रमण है, जिसके लिए कोई माफी या स्वीकार्यता नहीं हो सकती। साथ ही, यह अपने आप में दूसरे समुदाय की भावनाओं को चोट पहुँचाना, उन्हें चिढ़ाना और अयोध्या जैसी कार्रवाई के लिए उकसाना भी है।

मैं इस ढांचे को तोड़े जाने का समर्थन तो नहीं करता, लेकिन इसे शहर की जामा मस्जिद कहे जाने पर भी आपत्ति जताता हूँ और तत्काल प्रभाव से यहाँ नमाज पढ़ने पर रोक लगाने की मांग भी करता हूँ। इस ढांचे को यदि मुगलिया आक्रमणकारियों की बर्बरता के सबूत के तौर पर संरक्षित किया जाता है तो इससे मुझे कोई समस्या नहीं।क्या भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के समर्थक और गंगा जमुनी तहजीब के पैरोकार मेरी अपील को सुन और समझ रहे हैं? धन्यवाद।

(अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से)

अभिरंजन कुमार का यह पोस्ट आप यहां पढ़ सकते हैं-



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