क्यों करनी चाहिए सावन की सोमवारी? इस कहानी में छिपा है जवाब
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Savan Somvari vrat Katha

भगवान भोलेनाथ (Baba Bholenath) को बहुत ही दयालु माना गया है। उनके बारे में ऐसा कहा गया है कि सच्ची श्रद्धा से यदि कोई उनकी आराधना करे तो वे उस पर अपनी कृपा जरूर बरसाते हैं। सावन के महीने के दौरान भगवान शिव (Lord Shiva) की भक्ति यदि पूरी निष्ठा के साथ की जाए तो बाबा भोलेनाथ हर मनोकामना जरूर पूरी करते हैं।

सावन में सोमवारी यानी कि सोमवार का व्रत करने का बड़ा महत्व है। यदि आप सोमवारी करने के दौरान इसकी कथा भी पढ़ते या सुनते हैं तो भगवान शिव इससे बहुत प्रसन्न होते हैं। यहां हम आपको सोमवार के पीछे की इसी कथा के बारे में बता रहे हैं।

समृद्ध साहूकार

सोमवार की कथा कुछ ऐसी है कि एक नगर में एक साहूकार रहता था। किसी चीज की कोई कमी उसके घर में नहीं थी। धन-धान्य, हर तरह की सुख-समृद्धि उसके घर में मौजूद थी। यदि किसी चीज की कमी थी तो वह संतान की कमी थी। साहूकार इससे बड़ा दुखी रहता था। ऐसे में उसने भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने की ठान ली।

उसने हर सोमवार को भगवान शिव का व्रत रखना शुरू कर दिया। वह मंदिर जाकर महादेव की पूजा अर्चना भी करता था। जिस विधि-विधान और श्रद्धा के साथ यह साहूकार व्रत करता था, उसे देखकर माता पार्वती बड़ी प्रसन्न हुईं। मां पार्वती (Maa Parvati) ने भगवान शिव (Lord Shiva) से साहूकार की मनोकामना पूर्ण कर देने के लिए कहा।

झुक गए बाबा भोलेनाथ

इस पर बाबा भोलेनाथ ने मां पार्वती से कहा कि इस धरती पर जो भी आया है,, उसे अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, लेकिन मां पार्वती ने जब साहूकार की मनोकामना को पूर्ण करने का उनसे निवेदन किया तो भगवान शंकर इसे टाल नहीं सके। आखिरकार उन्होंने साहूकार को वरदान दे ही दिया। हालांकि, माता पार्वती को भगवान शिव ने यह भी बताया कि उसका पुत्र केवल 12 साल की आयु तक ही जीवित रहेगा।

पुत्र रत्न की प्राप्ति

साहूकार (Sahukar) की पत्नी को फिर एक बेटा हुआ। जब उसकी उम्र 11 साल की हो गई तो साहूकार ने उसके मामा को आमंत्रण भेजा और उसके साथ अपने बेटे को पढ़ने के लिए काशी (Kashi) भेज दिया। साथ में उसने उसके मामा को बहुत सारा धन भी दे दिया और कहा कि रास्ते में दान-पुण्य करते जाना। ब्रह्मणों को भोजन कराते जाना। दोनों मामा-भांजा इस तरह से काशी के लिए निकल पड़े।

राजकुमारी से शादी

रास्ते में रात के दौरान वे एक नगर में रुके। यहां के राजा की बेटी का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार (Rajkumar) से उसकी बेटी का विवाह हो रहा था, वह एक आंख से काना था। ऐसे में राजकुमार के पिता ने सोचा कि क्यों ना साहूकार के बेटे को ही दूल्हा बना कर शादी करवा दी जाए और बाद में ढेर सारा धन देकर उसे विदा कर दिया जाए। इस तरीके से राजकुमारी उसके नगर में आ जाएगी। उसने ऐसा ही किया और दूल्हे के कपड़े पहना कर साहूकार के बेटे की शादी राजकुमारी से करवा दी।

शादी भले ही साहूकार के बेटे ने कर ली, लेकिन ईमानदारी दिखाते हुए उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया कि मुझसे तुम्हारी शादी हुई है, मगर तुम्हें काना राजकुमार विदा करके ले जाने वाला है। मैं पढ़ने के लिए काशी जा रहा हूं। बाद में राजकुमारी ने जब ये पढ़ा तो उसने राजा को सारी बात बता दी। बारात को बिना राजकुमारी के ही लौटा दिया गया।

बेटे की मौत

इधर काशी में साहूकार के बेटे ने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी। समय-समय पर उसके मामा यज्ञ और अनुष्ठान कराते रहते थे। साहूकार का बेटा 12 साल का हो गया। उस दिन भी यज्ञ हो रहा था। उसने बताया कि तबीयत उसकी कुछ ठीक नहीं है। इस पर मामा ने उसे अंदर जाकर थोड़ा आराम करने के लिए कहा। हालांकि 12 साल का होने पर उसकी मौत हो गई।

यह देखकर मामा खूब रोने लगा। संयोग से माता पार्वती और भगवान शिव वहां से गुजर रहे थे। माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि मुझे इसका रोना देखा नहीं जा रहा है। आप कृपया इस के दुख को दूर कर दें। भगवान शिव ने उस लड़के को देखकर मां पार्वती को बताया कि यह तो साहूकार का बेटा है, जिसे मैंने 12 वर्ष जीने का वरदान दिया था।

कर दिया जीवित

माता पार्वती ने इस पर भगवान शिव से उसे जीवित करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि साहूकार ने आपकी इतनी भक्ति की है। उसने हर सोमवार को आपका व्रत किया है। भगवान शिव ने बात मान ली और उसे जीवित कर दिया।

इसके बाद काशी में शिक्षा पूरी करके अपने मामा के साथ वह लौटने लगा। उसी नगर में वह रुका जहां उसकी शादी हुई थी। वहां उसने यज्ञ कराया। राजा ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसका स्वागत-सत्कार किया। इसके बाद बहुत से धन और कपड़ों के साथ अपनी राजकुमारी को उसे सौंप कर उसके साथ विदा कर दिया।

खुश हो गया साहूकार

इधर साहूकार और उसकी पत्नी ने अन्न-जल त्याग करके खुद को एक कमरे में बंद कर रखा था। उन्होंने ठान लिया था कि यदि पुत्र की मृत्यु का समाचार मिलता है तो वे भी प्राण त्याग देंगे। जब उन्हें अपने बेटे के आगमन की खबर मिली तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने अपने पुत्र के साथ अपनी पुत्रवधू का भी खूब स्वागत-सत्कार किया।

सपने में आये भोलेनाथ

भगवान शिव उस रात उस साहूकार के सपने में आए और कहा कि तुमने पूरी निष्ठा के साथ सोमवार का व्रत किया है और व्रत कथा कही है। तुम्हारे बेटे का जीवन इसी का फल है। यही वजह है कि सोमवारी का व्रत करने के दौरान भगवान शिव की व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए। इससे भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

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